बीजेपी–शिवसेना (शिंदे गुट) ने जवाबी रणनीति के तौर पर ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का नारा

उद्धव -राज ठाकरे के मराठी अस्मिता के मुकाबले के लिए बीजेपी-शिवसेना ने चला बंटेंगे तो कटेंगे का दांव
मुंबई की राजनीति में मराठी अस्मिता एक बार फिर केंद्र में है। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के मराठी मुद्दों को धार देने के प्रयासों के बीच बीजेपी–शिवसेना (शिंदे गुट) ने जवाबी रणनीति के तौर पर ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का नारा उछाल दिया है।
बीएमसी चुनाव में एक बार फिर विधानसभा चुनाव जैसे नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं। उद्धव सेना और मनसे ने मराठी मानुस और मराठी अस्मिता का भावनात्मक कार्ड खेल दिया है तो बीजेपी भी बंटेंगे तो कटेंगे को दोबारा चुनाव में ले आई है।
इसके अलावा एक डेमोग्रैफिक रिपोर्ट का जिक्र भी सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है।
यह संदेश सीधे तौर पर विपक्षी खेमे की एकजुटता पर सवाल उठाते हुए मतदाताओं को विभाजन के नुकसान गिनाने की कोशिश है।
सत्तारूढ़ गठबंधन का दावा है कि मराठी पहचान की आड़ में राजनीति करने से विकास और स्थिरता प्रभावित होती है, जबकि उनकी प्राथमिकता सुशासन, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार है।
वहीं उद्धव–राज खेमे का आरोप है कि मराठी भाषा, रोजगार और स्थानीय हितों को हाशिये पर धकेला जा रहा है, जिसे वे चुनावी मुद्दा बना रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का नारा शहरी मराठी और गैर-मराठी वोटों के संतुलन को साधने की कोशिश है, ताकि विपक्ष की अस्मिता-आधारित राजनीति की धार कुंद की जा सके।
आने वाले दिनों में यह टकराव और तीखा होने के संकेत हैं, जहां एक ओर अस्मिता बनाम विकास की बहस होगी, तो दूसरी ओर गठबंधन बनाम विभाजन का संदेश मतदाताओं तक पहुंचेगा।




